भारतीय जनतंत्र


          जनतंत्र शासन-प्रणाली को स्पष्ट करते हुए अमेरिका के सोलहवें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने कहा था कि "प्रजातन्त्र वह शासन है, जिसमें जनता द्वारा जनता के हित के लिए जनता की सरकार की स्थापना की जाती है"। अर्थात प्रजातंत्र मतलब लोकतंत्र, जनतंत्र! जनता के चुने हुए व्यक्ति जनता के हित को दृष्टि में रखकर देश का शासन चलाते है। जनतंत्र ‘डेमोक्रेसी’ शब्द का रूपांतर है। डेमोक्रेसी शब्द की व्युत्पत्ति ग्रीक भाषा के दो शब्दों ‘डोमोस’ तथा ‘क्रेटीक’ से मिलकर हुई है। ‘डोमोस’ का अर्थ है शक्ति तथा क्रेटीक का अर्थ है जनता। इस प्रकार का शाब्दिक अर्थ के अनुसार ‘डेमोक्रेसी’ अथवा जनतंत्र का अर्थ है – जनता के हाथ में शक्ति। अब्राहम लिंकन ने यह भी लिखा है – ‘जनतंत्र जनता का जनता के द्वारा जनता के लिए शासन है ‘|

         भारतवर्ष दुनिया का सबसे बड़ा जनतंत्र है और उसकी परंपरा प्राचीन एवं गौरवशाली है। पुराने समय में भले ही जनता का शासक राजा होता था किंतु वह अपने शासन में जनता के हर सुख-दुख का भागीदार होता था। राम-राज्य में भी राजा भले ही राम थे पर उनका जीवन जनता के लिए था। इसी समृद्ध परंपरा के करण भारत सोने की चिड़िया कहलाता था। मुगलों के आगमन से जनतंत्र परंपरा का ऱ्हास होने लगा। अंग्रेजों ने लगभग २०० वर्ष तक भारत में राज्य किया। जनतंत्र धूमिल हो गया और भारत की संपत्ति का बड़ा भाग उन्होंने लूट लिया। अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ जन-विद्रोह शूरू हो गया। आज़ादी मिली और २६ जनवरी, १९५० को जनतंत्र की स्थापना हुई। जनता में जनतंत्र की आशा पुनः जीवित हो उठी। जनतांत्रिक मूल्यों के प्रति आस्था जागृत होने लगी।

 भारत में जनतंत्र की स्थापना के बाद देश में औद्योगिक क्रांति शुरु हो गई। और जब अधिकांश विकासशील देशों ने राष्ट्र निर्माण को बढ़ावा देने और विकास को असलियत में उतारने के लिए सत्तावादी विकल्प का चयन किया, तब ऐसे समय में भारत ने एक बहु-पक्षीय लोकतंत्र चुना। और कई तनावों और अक्षमताओं के बावजूद यह फल-फूल रहा है। अनियंत्रित लोकतंत्र, गठबंधन सरकारों और एक दशक के दौरान जिसमें विभिन्न राजनीतिक दलों ने सत्ता में होना, आदि के बावजूद १९९१ में भारत का आर्थिक उदारीकरण और उत्तरवर्ती सालों में विकास हुआ। भारत का उदाहरण यह साबित करता है कि जनतंत्र निपुणता के साथ ऐसी नीतियों को बनाने और अंमल में लाने के लिए प्रबंध कर सकता है जो समाज या राज्य को बाधित किए बिना प्रभावशाली होती हैं। केवल जनतंत्र ही शासन की सहमति से और बड़े पैमाने पर विद्रोह को भड़काने के बिना इस तरह के उल्लेखनीय परिवर्तन को बढ़ावा दे सकता है। केवल जनतंत्र ही विविध नैतिक, धार्मिक, भाषाई और सांस्कृतिक परिस्थिति के लोगों को यह महसूस कराता है कि उनके पास राष्ट्र की प्रगति में समान हिस्सेदारी, कानूनों के तहत समान अधिकार और अपनी राजनीति और अर्थव्यवस्था में उन्नति के समान अवसर हैं। भारतीय लोकतंत्र एक ताकत है, कमजोरी नहीं। भारत की ताकत यह है कि इसने खुद को एक जमीन होकर भी अनेक विचारोंको गले लगाकर अपना एक अनुठा विचार संरक्षित किया है। यह ऐसा देश है जो जाति, पंथ, रंग, संस्कृति, भोजन, विश्वास, वेशभूषा और रिवाज के अंतर को टिकाकर एक लोकतांत्रिक सहमति के ओर आकर बचकर रहता है। और यह सर्वसम्मति इस साधारण विचार पर निर्भर है कि, एक वैविध्यपूर्ण जनतंत्र में, आपको हर समय सहमत होने की आवश्यकता नहीं! और इसलिए स्वतंत्रता पाने के इतने साल बाद भी भारत तमाम तनावों के बावजूद जीवित और पनपा है क्योंकी यहाँ  सर्वसम्मति के बिना भी मतैक्य बनाए कैसे रखते है यह पता है।

 भारत में लोकतंत्र की वैधता कुलीन सज्जन वर्ग के बजाय वंचितों की विशाल संख्या के विश्वास से आती है। यह गरीब है जो बड़ी संख्या में मतदान करने के लिए निकलता है, क्योंकि गरीब जानते हैं कि उनके वोट मायने रखते हैं। वे यह भी मानते हैं कि अपने मताधिकार का इस्तेमाल करना यह व्यक्त करने का सबसे प्रभावी साधन है कि वे वास्तव में सरकार से क्या माँग करते हैं। विद्रोह या अपमान के बजाय शासकों के खिलाफ मतदान में सरकार के साथ निराशा प्रकट होती है। लेकिन जब हिंसक आंदोलन उत्पन्न होते हैं, तो उन्हें अक्सर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में गुंज़ाइश के माध्यम से नाकाम किया जाता है, और इन्हीं कारणों की वजह देश का वातावरण अशांत एवं अराजकतापूर्ण हो रह है। यह "लोकतंत्र का मंदिर", जैसा कि भारतीयों ने लंबे समय से अपनी संसद की आराधना की है, वह आज अपने ही पुजारियों से लथपथ हो गया है, और अब उसे एक सुधार की सख्त जरूरत है। संसद का कामकाज, अधिकांश भारतीयों के लिए, एक शर्मिंदगी, और कई के लिए, एक घृणास्पद बन गया है। लोग अपने टेलीविजन को चालू करते हैं और अविश्वास में देखते हैं क्योंकि उनके चुने हुए प्रतिनिधि नारे लगाते हैं, गालियाँ चिल्लाते हैं और संक्षेप में कुछ भी करते हैं, लेकिन वे वास्तव में संसद के लिए चुने गए हैं।

         जनतंत्र की सुरक्षा और सफलता के लिए आवश्यक है कि हमारे राजनेता दलबंदी, क्षेत्रीयता, भ्रष्टाचार, परिवारवाद आदि दोषों से मुक्त होकर राष्ट्रहित में समर्पित समर्थ और अनुभवी प्रत्याशियों को टीकट दें और जनता योग्यता तथा ईमानदारी के आधार पर अपने नेतृत्व का निर्भय और निर्लोभ होकर चयन करे तब ही जनतांत्रिक मूल्यों की रक्षा संभव है और जनता का हित सुरक्षित हो सकता है। केवल जनतंत्र की दुहाई देते हुए राजतंत्र की सामंतवादी विलासिता को पोषित करने से साधारण जनता का भला नहीं हो सकता। हालाँकि भारत की चुनौतियाँ बहुत बड़ी हैं, एक लोकतंत्र के रूप में हम हमेशा से जानते हैं कि हमारी प्राथमिकताएँ गरीब से गरीब व्यक्ति तक पहुँचनी चाहिए। हमारा विकास कभी भी प्रति व्यक्ति आय के आंकड़ों के बारे में नहीं था। यह हमेशा एक अंत का साधन था। और जिस साध्य का हमने देखभाल किया वह हमारे समाज के सबसे कमजोर वर्गों के उत्थान, उनके लिए रोजगार की संभावनाओं का विस्तार और सभ्य स्वास्थ्य देखभाल और स्वच्छ पेयजल का प्रावधान था।

प्रसिद्ध नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने कहा कि - एक राष्ट्र जनतंत्र के लिए योग्य नहीं है, बल्कि यह जनतंत्र के माध्यम से वह योग्य होता है। निष्कर्ष रूप में एक सतर्क आशावादी होकर मैं यह तर्क दूंगी कि भारत की जनतांत्रिक लोकाचार की नींव बुनियादी रूप से मजबूत है और हमें अब यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी समुदाय अवांछित रूप से लक्षित नहीं है। पिछले कई वर्षों में आई और आनेवाले भविष्य में खुद को प्रस्तुत करने वाली चुनौतियां बनी रहेंगी, लेकिन हमारे राजनीतिक वर्ग, नागरिक समाज, न्यायपालिका, और मीडिया और सभी नागरिकों की मजबूत आवाज़ एक दूसरे से समान रूप से मिलेंगे। और जिस तरह हम जागरूक हैं, और आधुनिक भारत की मजबूत जनतांत्रिक परंपराओं पर हमें गर्व है, हमें अपनी खुद की ज़िम्मेदारियों के साथ अपने सभी लोगों को इक्कीसवीं सदी में आगे बढ़ने के लिए और सभी व्यवसायों को विकसित करने की भी जिम्मेदारी लेनी चाहिए।  इसीलिए जनतंत्र और विकास एक साथ चलते, और जो भारत एक मजबूत, समृद्ध और न्यायपूर्ण समाज के रूप में विकसित होता है, वह केवल एक जनतांत्रिक भारत ही हो सकता है! अंत में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री. अटल बिहारी वाजपेयी जी की पंक्तियाँ याद आती हैं, वे कहते हैं कि,

सत्ता का खेल तो चलेगा, सरकारे आएँगी, जाएँगी, 

पार्टियाँ बनेगी, बिगड़ेगी, मगर ये देश रहना चाहिए..

इसका लोकतंत्र अमर रहना चाहिए।


- छत्रपती शिवाजी कॉलेज, सातारा (स्वायत्त) आयोजित राष्ट्रीय आंतरमहाविद्यालयीन निबंध लेखन प्रतियोगिता के लिए।


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